मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत चिकित्सा का पेशा अब व्यवसायिक और गैर मानवीय भी हो चला

मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत चिकित्सा का पेशा अब व्यवसायिक और गैर मानवीय भी हो चला
रायबरेली---उत्तरप्रदेश के कई जिला चिकित्सालय लापरवाही भ्रष्टाचार एवं चिकित्सको की निजी चिकित्सा का अड्डा बनकर रह गया हैं!इस पर अंकुश लगाने के लिए कोई भी सार्थक प्रयास होते दिखाई नही दे रहें है। उच्च चिकित्साधिकारियों की उदासीनता एवं धींगा मस्ती का शिकार है,आये दिन सरकारी चिकित्सकों पर निजी चिकित्सा करने के आरोप भी लगते रहते है। लेकिन किसी के कान पर जूं नही रेंगती नजर आ रही है! चिकित्सा पूरी तरह एक मानवीय पेशा है लेकिन धीरे धीरे यह व्यवसाय होते चला गया है। व्यापारिक होना बुरी बात या गलत बात नहीं है लेकिन मानवीय संवेदनाओं को तार तार कर लूट खसौट करना जरूर गलत है। जब कुछ उत्तरप्रदेश के जिलों के जिला चिकित्सालय मे दरअसल बागडोर ही सुस्त हाथों में हो तो फिर अधिनस्थो पर कानून का चाबुक या सख्ती कैसे की जा सकती है!तथा वही सूत्रों की माने तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के यहां चिकित्साधिकारी भी कई बार चर्चाओं का शिकार रहे है तथा वही आपरेशन मे लेन देन का आरोप भी लगे! लेकिन सरकार की तरफ से ऐसे चिकित्सको का कुछ नही हुआ?सवाल यह है कि जब खुद उनका दामन ही पाक साफ नही है तो यह अधिकारी पर क्या खाक लगाम लगायेगें! जिला चिकित्सालयो मे तैनात कुछ चिकित्सकों की भी मनमानी इस कदर बढ गई है कि वह कब बैठते है और कब नही इसका फैसला वह स्वंय करते है। सूत्रों की माने तो साथ ही इन्होनें अपनी निजी प्रैक्टिस के अड्डे भी चला रखे है तथा दोनो हाथो से जमकर नोट पीट रहे है विगत वर्षों पहले एक न्यूज चैनल ने कुछ समय पूर्व एक जिले के सरकारी चिकित्सक का एक स्टिंग आपरेशन किया था लेकिन उससे भी इन उच्च अधिकारियो ने कोई सबक नही सीखा था! भ्रष्टाचार यहा पर पूरी तरह हावी है किसी भी विभाग मे बिना पैसे के कोई काम नही होता मरीजो को धक्के खाने होते है दिक्कतो का सामना करना पडता है लम्बी लम्बी कतार मे खडें रहते है,मरीजो को भेड बकरी की तरह खडा रहना पडता है यह पूरी तरह अवमान्य है जिला चिकित्सालयो की व्यवस्था की सम्पूर्ण एवं सुचारू रूप से चलाने में यहा के उच्चाधिकारियों भ्रष्टाचार मे लिप्त होने के कारण बेहतर व्यवस्था नही बना पा रहे है? इसके लिये सीधे तौर पर कौन जिम्मेदार है ? इनकी विफिलताओं भरी कार्यप्रणाली शासन स्तर पर तय की जानी बहुत जरूरी है।सूत्रों के अनुशार यदि ऐसे चिकित्सको की बात करें जो अस्पताल मे रहकर अपनी सेवाऐं दे रहे है तो स्पष्ट होता है कि यह मरीजो को बीमारी की गम्भीरता बताकर अच्छे इलाज के लिए अपने निजी चिकित्सालय या किसी अपने जानने वालो के नर्सिग होम पर भेजने या आने को कहते है!जहॉ पर मरीजो से फिर जमकर उगाही की जाती है! यह अमानवीय एवं गैरकानूनी है लेकिन अफसोस की बात है कि इतना सब कुछ हो रहा है और किसी पर कोई असर नही है शासन सत्ता नियम कानून दीमक रूपी भ्रष्टाचार के सामने बोने पडते हुए नजर आते है?मरीज बेचारे चिकित्सा जैसे बुनियादी हक के लिए सरकारी अस्पताल में केवल धक्के खाकर जाते हुए ज्यादा नजर आते है!सरकार को चाहिए कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ऐसे जिलों को चिन्हित कर ओर एक गुप्त तरीके से एक जाच कमेटी बनाकर सरकारी अस्पातलों के औचक निरीक्षण आदि समय समाय पर करायें जाने चाहिए ताकि व्यवस्थाओं में कुछ तो सुधार हो सके!!

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